Man Kya Hai (मन क्या है)-man ko shant kaise kare in hindi

 Hello दोस्तों आज हम इस पोस्ट में जानेंगे की (man kya hai) मन क्या होता है और इसका हमारी जिंदगी में क्या रोल है

मन क्या है (What is mind in Hindi)

यदि आप भी अपने मन की हरकतों से परेशान हैं। 

यदि आप भी खुद से ही हार जाते हैं और अपने मन के द्वारा बनें विकारों में फस कर रह जाते हैं।

यदि आप भी बार-बार खुद से अपने आपको वादा करते हैं और फिर वादा तोड़ भी देते हैं

अगर आप भी किसी लत से परेशान हैं, 

तो इस पोस्ट को पूरी पढ़ें आपकी सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी और आप अपने मन को काबू कर पाएंगे। यह पोस्ट हमने spiritual knowledge के अनुसार बनाई है आप ध्यान से अगर इसे पड़ेंगे तो आपको दूसरी किसी पोस्ट पढ़ने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। तो चलिए शुरू करते हैं।

मन क्या है (What is mind in Hindi)

दोस्तों हमारे दो प्रकार के मन होते हैं जिसके बारे में संतों ने कहा है कि

काया माही दो मन, इनमें कौन हमार।

को अमरापुर जात है, को भरमें संसार।।

हमारे दो प्रकार के मन होते हैं जिनमें से एक बुरा है और एक अच्छा है साधु संत कहते हैं कि इनमें से कौन सा हमारा है यह हमें जांच कर लेनी चाहिए और हमें अच्छे मन का साथ देना चाहिए। क्योंकि बुरा मन  हमें बुराइयों में ढकेलता है और अच्छा मन हमें अमरापुर ले जाता है अर्थात् परमात्मा से मिलता है। 

दो प्रकार के मन होते हैं


मन (concious mind)

मनुष्य का मन बहुत प्रकार के विकारों से घिरा रहता है और बुरे ख्यालों फसा रहता है। 

कहते हैं कि ये मन मैल नहीं जा सकता मन का गंदापन खतम नहीं हो सकता है  यह तो परमात्मा के ज्ञान से भक्ति के प्रभाव से ही नष्ट हो सकती है अर्थात् इसको निष्क्रिय किया जा सकता है। काल ने मन रूप में आत्मा को जकड़ रखा है, भगवान ने इसमें आत्मा के साथ भी एक शक्ति निज मन जोड़ रखी है। अब जैसे कोई भी दुष्कर्म करने की कोशिश करता है चोरी की, ठग्गी की, या कोई उंच नीच की तब अन्दर से आवाज निज मन की आती है। आत्मा कुछ नहीं कर पाती यह तो विवश हो चुकी होती है क्योंकि इसको मन नचाता है। और निजमन इसको संकेत करता है कि मानजा इस बुराई को मत कर लेकिन आत्मा निज मन की ना मानकर इस काल रूपी मन के विवश हो कर इसके आधीन रहती है। और जब हम भगवान से जुड जाते हैं और भक्ति करते ज्ञान को समझते हैं तब यही निजमन आत्मा को भ्रमित नहीं होने देता। भगवान की शरण में आने के बाद हमारे अंदर ईश्वरीय शक्ति का संचार होता है तब निजमन आत्मा को भगवान की तरफ खिचाव करता है जब हम भगवान के ज्ञान से परिचित हो जाते हैं तब हम इस मन रूपी काल से कैसे बच सकते हैं 

मन से बचाव के तरीके

परमात्मा इस मन के माध्यम से इस जीव आत्मा को समझा रहे हैं और कहते हैं कि इस नकली मन की बातों में मत आओ काल के इन चोंचलो से बचो अन्यथा आप अपने पुन्यों की कमाई को भी बर्बाद कर जाओगे और भविष्य में फिर कुछ नहीं बन पाएगा जो तेरी पिछले जन्मों की पुन्य की कमाई थी जिससे ये मनुष्य जन्म मिला जिससे आपको और पुन्य कमाने थे भगवान का नाम लेना था पूर्ण गुरु की तलाश करके उसकी शरण करनी थी ! वो न करके इस मन के आधीन होकर तुमने यहीं बीड़ी, शराब, मांस तमाखु, स्वांग सिनेमा देखकर तुमने पूर्व जन्म की पुन्य की कमाई को भी खोकर अपना जीवन बर्बाद कर दिया। 

भगवान कहते हैं कि अरे मन तू निकम्मा हो गया उस पूर्ण परमात्मा को भूल चुका है तुझे इसका दन्ड मिलेगा तू चौरासी लाख योनियों में कष्ट उठाएगा ।

मन कृतघ्नी तू भडवा रे, तुझे लागे साहिब कड़वा रे।

इस मन को परमात्मा कह रहे हैं कि आज तुझे रागनी अच्छी लगती हैं फिल्मी गाने अच्छे लगते हैं और माया जोड़ने के चक्कर में कितना प्रयत्न करता है। पूरा दिन झूठ कपट करता फिरता है और कोई कहदे कि दो घण्टे भगवान का नाम जपले तो कतई अच्छा नहीं लगता है इसे ! कोई रूचि नहीं होती है।

कहते हैं कि इतना उस्ताद है ये काल रूपी मन कि ज्ञानी और ज्ञाता बड़े बड़े ऋषि सभी सिर पीटते हैं इनसे इतनी बड़ी बड़ी गलतियां करवा देता है और संसार में निन्दा के पात्र बनते हैं और फिर ये पछताते रहते हैं   

उदाहरण - अब जैसे एक बार ऋषि विश्वामित्र तप कर रहे थे तभी इन्द्र देव ने एक उर्वशी भेज दी वो उनके साथ रही पत्नी रूप में फिर कन्या को जन्म देकर के ऋषि के पास कन्या को छोड़कर चली गई और कह दिया कि  ऋषि जी तुम्हारा और मेरा इतना ही संयोग था। अब आप इस बेटी को पालना! तुम कैसे ऋषि हो घर से निकले थे क्या करने के लिए और यही कर बैठे कुछ और, ऐसा कहकर वो चली गई 

उस बेटी का नाम सुकन्तला रखा उसको फिर कनवय ऋषि के पास छोड़ा और उसका विवाह करवाया।

तो यहां भगवान कहते हैं कि जब तक हम पूर्ण परमात्मा की शरण में नहीं आएंगे तब तक ये काल यानी हमारा मन दाव लगाए रहता है ।

गीता के अनुसार मन क्या है। (What is mind by geeta in Hindi)

दोस्तों अब हम आपको बताएंगे कि श्रीमद्भागवत गीता जी के अनुसार मन क्या  (What is mind by geeta in Hindi) है।

प्राणी के शरीर का एक अदृश्य अंग है मन, जो दिखाई नहीं देता परन्तु वही हमारे शरीर का सबसे शक्तिशाली हिस्सा है लेकिन यह याद रखो कि मन का आत्मा से कोई संबंध नहीं होता। आत्मा यदि रथ में बैठा हुआ रथ का स्वामी है तो मन शरीर रूपी रथ का सारथी है। 

यह मन ही इंद्रियों के घोड़ों को इधर-उधर भटकाता है। कभी यौवन के आवेश में यही चंचल मन मनुष्य को इस ब्रहम में डाल देता है, कि वो सर्व शक्तिमान है वो सब कुछ कर सकता है वो यहां का राजा है जिसके आगे हर कोई झुक जाने को विवश है और जिसे हर कोई प्रणाम करता है। जिस तरह दीपक की बाती को दीपक तले छिपा अंधेरा दिखाई नहीं देता उसी तरह जवानी को उसके पीछे छिपा बुढ़ापा और कमजोरी दिखाई नहीं देती परंतु जब शरीर के दीपक में योवन शक्ति का घी जल जल कर समाप्त होने लगता है और दीपक तले छुपा अंधेरा बढ़ने लगता तो मनुष्य घबराकर चिल्लाने लगता है मैं बीमार हूं, मैं दुखी हूं, मैं मर रहा हूं, मुझे बचाओ, यह रोने का नाटक भी मन ही करता है। 

मनुष्य को मैं की घमंड़ की मदिरा पिलाकर मदहोश करने वाला पाखंडी केवल मन ही है उसके हाथों में मोह माया का जाल है जिसे वह मनुष्य की कामनाओं पर डालता रहता है और उसे अपने वस में करता रहता है। यह मन शरीर से भी मोह करता है अपनी खुशियों से भी मोह करता है और अपने दुखों से भी। खुशियों में खुशियों से भरे गीत गाता है तो दुख में दुख से भरे गीत गुनगुनाता है अपने दुख में दूसरे को शामिल करके उसे खुशी होती है।

 किसी भी प्राणी को उसका मन जीवन के अंत तक अपने जाल से निकलने नहीं देता, रस्सी में बांधकर उसे तरह-तरह के नाच नचबाता रहता है वह जीव को उतनी फुर्सत भी नहीं देता कि वह अपने अंतर में झांककर आत्मा को पहचान सके और आत्मा के अंदर किस परमात्मा का प्रकाश है उस परमात्मा का साक्षात्कार करे। प्राणी के लिए आवश्यक है कि वो अपने मन को काबू में करके अपने अंतर में झांक कर आत्मा को देखे। तब उस आत्मा के अंदर उसे परमात्मा का स्वरूप स्पष्ट दिखाई देगा उसी को परमात्मा का साक्षात्कार कहते हैं।

जब तक तुम अपने आप को मन और विषयों के आधीन रहने दोगे तब तक वो तुम्हें नाच नचाता रहेगा। मनुष्य का शरीर एक रथ की भांति है, इस रथ के जो घोड़े हैं उन्हें मनुष्य की इंद्रियां समझो। जैसे - आंख, कान, नाक, मुख, जीभ आदि

इन इंद्री रूपी घोड़ों को जो सारथी चलाता है वह सारथी ही मन है। और उस रथ में बैठा हुआ जो आत्मा है वह उस रथ का स्वामी है मनुष्य की इंद्रियां विषयों की ओर आकर्षित होती रहती हैं और उसका मन इंद्रियों को विषयों की ओर ही दौड़ाता रहता है। यह तभी तक हो सकता है जब तक जीव आत्मा अपने मन को काबू में ना लाए जब तक मन काबू में नहीं आएगा तब तक वह इंद्रियों को विषयों की तरफ ही दौड़ता रहेगा। विषय उनको बुलाते हैं और इंद्रियां उनकी तरफ भागती हैं और मन जीवात्मा की परवाह किए बगैर आत्मा को उस ओर लिए जाता है परंतु जो तुम स्वयं मन के आधीन ना रहकर मन को अपने अधीन कर लोगे तो वही मन एक अच्छे सारथी की तरह तुम्हारे शरीर रूपी रथ को सीधे प्रभु के चरणों में ले जाएगा। तो दोस्तों अभी हमने जाना कि गीता जी के अनुसार मन क्या (What is mind in Hindi)होता है।

man me bure khayal aana

अगर आपके मन में बुरे ख्याल आते हैं तो आपको बता दें कि इससे बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप सच्चे गुरु की तलाश करके उनसे मुक्ति मन्त्र प्राप्त करके भक्ति करें । जिससे आपको बुराई से निजात मिलेगी और भी कई बहुत से लाभ आपको मिल जाएंगे आपका जीवन भी सुखी होगा।

आपको यह जानकारी कैसी लगी कमेंट करके हमें अवश्य ही बताएं दोस्तों हम मिलते हैं अगले लेख में तब तक के लिए धन्यवाद।


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